Wednesday, October 21, 2015

Bhay ka samna


                                        


दोस्तों ,कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं ,जिनके स्मरण मात्र से ही हमारे अंदर शक्ति का संचार होता है। स्वामी विवेकानंद का व्यक्तित्व ऐसा ही है।
आज उनके जीवन से सम्बंधित एक कहानी  प्रस्तुत कर रहा हूँ।
एक बार की बात है। स्वामी विवेकानंद कहीं जा रहे थे। तभी बंदरों ने उनका पीछा शुरू कर दिया। स्वामीजी भागने लगे। बंदर और तेजी से पीछे दौड़े। स्वामीजी पकड़ में अाने ही वाले थे। तभी एक आवाज़ गूंजी -ठहर जाओ। बंदरों का सामना करो। उनको डाँटो और वह भाग जायेंगे। स्वामी ने ऐसा ही किया। वह रुक गए। बंदरों की तरफ मुँह करके खड़े हो गए। ज्यों ही उन्होंने भृकुटि टेढ़ी की ,बंदर भाग निकले।
विवेकानंद ने आगे चलकर बहुत बार इस घटना का जिक्र किया। उन्होंने हमें बताया कि जबतक हम किसी भय से भागते हैं, वह कई गुना विकराल रूप धरकर हमारा पीछा करता है। हमें डराता  है। जैसे ही हम उसका सामना करने का साहस दिखाते हैं, उसकी शक्ति घटने लगती है।  और हमें आगे जाने का मार्ग मिल जाता है।
दोस्तों , ये घटना तो छोटी सी है। लेकिन जीवन का एक बड़ा सबक सिखाती है वो ये कि समस्या से भागने का मतलब दरअसल उसे बढ़ावा देना है। जैसे ही हम उसका सामना करते हैं , हमारे अंदर उसे परास्त करने का साहस भी आ जाता है।
स्वामी विवेकानंद ने अबतक लाखो -करोड़ों लोगों को प्रेरणा दी है।  आगे जाकर इस ब्लॉग पर भी उनके और प्रसंग और विचार आएंगे।
आज एक छोटी पोस्ट लिखी है क्योंकि एक बड़ी रचना को अगली पोस्ट में डालना चाहता हूँ। अगले दो तीन दिन में आ जाएगी।
धन्यवाद।

Saturday, October 17, 2015

Sukhi rahne ka mantra

दोस्तों , कहानियां हमेशा से ही हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं।  कुछ तो ऐसी होती हैं जो हमारे दिल और दिमाग पर  असर छोड़ जाती हैं।
अपने ब्लॉग की पहली प्रेरणास्पद कहानी के रूप में आज ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत कर रहा हूँ जो  उपयोगी है - उन लोगों के लिए जो जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं और निराशा एवं हताशा जैसी मुश्किलों को परास्त करना चाहते हैं।
दोस्तों , अब और भूमिका न बढ़ाते हुए मैं इस कहानी को प्रस्तुत  कर रहा हूँ।
एक राजा था। एक दिन उसके मंत्री की मौत हो गयी। राजा बड़ा परेशान। वह राज्य का अधिकांश भार मंत्री को देकर निश्चिन्त रहता था। अब उसके जैसा बुद्धिमान और ईमानदार व्यक्ति कहां से मिले ? राजा ने बहुत लोगों के इंटरव्यू लिए लेकिन पुराने मंत्री जैसा कोई मिला ही नहीं।
राजा काफी ऊब गया था। एक दिन अकेला चल दिया -शिकार खेलने। राजधानी से बाहर  , काफी दूर , घने जंगलों में पहुंचकर रास्ता भटक गया। शिकार तो मिला नहीं ,ऊपर से रास्ता खोजने की परेशानी आन पड़ी। शाम ढल गयी। रास्ता नहीं मिला। पूर्णिमा की रात थी। चाँद की रौशनी में राजा इधर - उधर देखने लगा। तभी उसे जंगल के बीच एक छोटा मैदान दिखाई दिया जिसमें एक झोपडी बनी थी। झोंपड़ी की खिड़की से दीपक की रोशनी छिटककर बाहर आ रही  थी। राजा पेड़ों के पीछे छुपकर देखता रहा ,इंतज़ार करता रहा। तभी एक  आदमी बाहर आया। झोंपड़ी के आगे साफ़ सुथरी जगह पर टाट बिछाकर लेट गया। वो चाँद को देखता रहा ,फिर एक गीत गुनगुनाने लगा।
चांदनी रात।  जंगल का वातावरण। और मधुर गीत की गूंज। राजा को आनंद आ रहा था। वह उस व्यक्ति के समीप जाकर खड़ा  हो गया। वह व्यक्ति चाँद को देखने और गाने में मगन था। उसके वस्त्र फटे पुराने थे -लकड़हारा मालूम होता था। लेकिन उसके चेहरे पर स्वर्गिक आनंद की आभा थी। राजा के और नजदीक जाने पर उसका ध्यान टूटा।  वह उठ बैठा। नमस्कार करके अतिथि का सत्कार किया।  कन्दमूल फल खाने को दिए। चाँद की रोशनी तले राजा बैठ गया। गाना फिर सुनाने को कहा।
ठंडी -ठंडी सुखद हवा चल रही थी। लकड़हारे का मधुर गीत गूंज रहा था। राजा की थकान कोसों दूर भाग गयी। उसने बहुत सवाल पूछे। लकड़हारा अनाथ था ,लकड़ी बेचकर गुजारा  करता था।  लेकिन था बहुत  होशियार और मेहनती। राज्य की समस्याओं को बहुत गहराई से समझता था।  राजा ने उसे प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया। तभी लकड़हारे ने एक  शर्त रखी- मैं हर पूर्णिमा को छुट्टी पर रहूँगा\और इसके लिए मुझसे  नहीं पूछा जायेगा। इस दिन मैं राज्य द्वारा दी जानेवाली कोई सुविधा और सुरक्षा नहीं लूंगा।  राजा ने शर्त मान ली और राजधानी ले आये।
लकड़हारा अपेक्षा से बेहतर सिद्ध हुआ। राज्य का प्रबंध बड़ी कुशलता से संभाला। प्रशासन में चुन चुनकर योग्य लोगों की नियुक्तियां की। अयोग्य लोगों को  किनारे कर दिया। पुराने मंत्री के मरने के बाद जितने घोटाले  हुए थे ,उनकी जांच करके दोषियों को सजा दी।
मंत्री के कार्यकाल में राज्य तेजी से प्रगति करने लगा। भ्रष्ट लोगों की शामत आ गयी। राज्य में सुख शांति छा गयी। राजा बहुत प्रसन्न रहने लगा।
लेकिन सारे दिन एक सामान नहीं होते। कहावत है न - चोर चोर मौसेरे भाई। राज्य के तमाम भ्र्ष्ट,अपराधी और बेईमान लोग नए मंत्री के खिलाफ संगठित होने लगे। योजनाएं बनाने लगे। कमजोरियां ढूंढने लगे।
विरोधियों ने लाख जतन  किये। पर सब व्यर्थ। मंत्री की कोई कमजोरी नजर नहीं आई। वह सुबह से देर रात  तक राजकाज  में व्यस्त रहता था। भाई -भतीजे थे नहीं। वेतन लेता नहीं था। ऊपर से राजा उसपर जान छिड़कते थे।
आख़िरकार कोशिशें रंग लांई। मंत्री की एक बात विचित्र थी। वह पूर्णिमा के दिन , सुबह सवेरे ,कहीं निकल जाता था। अगली सुबह लौटता था। वो कहा जाता था ,किसी को खबर नहीं। अगर कोई पूछता भी तो वह टाल जाता।
विरोधियों ने इस बात का फायदा उठाया। पडोसी राज्य के मंत्री के साथ मिलकर साजिश रची। ऐसा प्रचारित किया गया  कि  मंत्री देशद्रोही है। वह महीने में एक दिन पडोसी राज्य में जाकर सारे  गोपनीय रहस्य पंहुचा आता है।  तमाम सबूत भी गढ़े गए। राजा के कान भरे जाने लगे। राजा भी विचलित होने लगा। उसने भी कई बार पूछा था - पूर्णिमा को ही वह छुट्टी क्यों लेता है , कहाँ जाता है ,लेकिन मंत्री ने हमेशा टाल दिया।
अंततः राजा ने खुद जांच की सोची। पूर्णिमा के दिन वेश बदलकर मंत्री का पीछा किया। मंत्री मुँह अँधेरे ही घर से निकला। मुंह ढककर घोड़े पर बैठा और चल दिया। शीघ्र ही दोनों जंगल में आ गए। मंत्री अपनी झोपडी पर पहुंचा। राजसी वस्त्र बदलकर फटे पुराने वस्त्र पहन लिए।  झोपड़ी और मैदान बुहारकर साफ़ किया। टूट फूट की मरम्मत की। अपनी कुल्हाड़ी तेज की।  इसके बाद सुखी लकड़ियाँ एकत्रित करके और उन्हें काटकर गठठर बनाया। समीप के बाजार में गया।  लकड़ियाँ बेचकर चना चबेना ख़रीदा। शाम ढले अपनी  झोंपड़ी पर लौट आया। नहाया धोया। दीपक जलाया। भोजन किया। चारों तरफ चांदनी छिटकने लगी थी। राजा पेड़ पर चढ़कर सब देख रहा था।
भोजन के बाद मंत्री बाहर  आया।जमीन पर टाट बिछाकर लेट गया। चाँद को देखकर गाने लगा। वही पुराना लोकगीत जो राजा ने पहले सुना था। धीमी हवा में पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे। चांदनी छिटक रही थी. सोंधी मिटटी की खुशबू हवा में तैर रही थी। मंत्री चाँद को देखते हुए गीत गाने में मगन था।
राजा रुक न सका। सामने जा खड़ा हुआ। मंत्री उठ बैठा। राजा को  प्रणाम किया। राजा भी उसके साथ टाट पर बैठ गया।
राजा - तुम हर पूर्णिमा को यहीं आते हो ?लकड़ी काटते हो ,बेचते हो , चाँद को देखते हो?
मंत्री - हाँ महाराज।
राजा - आखिर किसलिए ?
मंत्री -क्या आप बताएँगे महाराज ,पहले मैं क्या था?
राजा - हाँ ,तुम लकड़हारे थे।
मंत्री -क्या मैं मजबूरीवश एक लकड़हारा था ?
राजा -नहीं। तुम चाहते तो कुछ अलग भी कर सकते थे। देखो ,तुम कितने अच्छे मंत्री और कूटनीतिज्ञ  साबित हुए हो।
मंत्री -महाराज ,मैं लकड़हारा इसलिए था क्योंकि मैं ये पसंद करता था। मैंने इसी जंगल में जनम लिया। माता पिता चल बसे। अनाथ होने के बाद इसी जंगल ने मुझे भोजन और आश्रय दिया। पेड़ पौधे और जानवर ही मेरा परिवार बन गए। मां की ममता और पिता का संरक्षण मुझे यहाँ की हवा में महसूस होता है।
राजा - क्या ये कोरी भावुकता नहीं है ?
मंत्री -नहीं महाराज , ये जमीन से जुड़ाव है। यही मेरा शक्तिस्त्रोत है। इसे कोई मुझसे नहीं छीन सकता। धन ,प्रतिष्ठा ,मंत्रिपद ,सब छिन सकता है।  लेकिन कोई भी मुझसे लकड़हारे की पहचान नहीं छीन सकता। हाथों की मेहनत नहीं छीन सकता।
मैं कन्द मूल खाकर वही स्वाद लेता हू , जो आपको राजसी भोजन में आता है। पेड़ -पौधो ,नदी-झरनों  और जानवरो को देखकर मुझे वही सुख मिलता है जो आपको अपना भरा -पूरा परिवार देखकर मिलता  है। चाँद को देखकर गीत गाते समय मुझे वही खुशी मिलती है जो आपको राजसिंहासन देता है।

राजा - यह तो कल्पनाओं में जीना हुआ मंत्री।
मंत्री- अपनी वास्तविक ताकत से जुड़ने की कल्पना हमें शक्तिशाली बनाती  है महाराज। यह जंगल। यह हवा। पेड़ -पौधों का संगीत। झरनों का पानी।चिड़ियों का कलरव। मेरा लोकगीत। चाँद की रोशनी। ये सब मुझे शक्ति देते हैं। इन्हे मुझसे कोई वापस नहीं ले सकता। जबतक मैं इनसे जुड़ा हूँ ,  प्रसन्न रहूँगा।
राजा - ये केवल एक कल्पना की उड़ान है।
मंत्री -अच्छा महाराज ,क्या आपको सिंहासन गंवाने का डर लगता है ?
राजा -हाँ ,चौबीसो घंटे। विरोधी हमेशा ताक में रहते हैं।
मंत्री - तब ये आपकी वास्तविक ताकत नहीं है महाराज जो कभी भी छिन सकती है।
राजा -तब मेरी असली ताकत क्या है ?
मंत्री -जनता में आपकी लोकप्रियता ही आपकी असली ताकत है। सिंहासन भले कोई ले ले ,लेकिन जनता हमेशा आपका साथ देगी।
राजा -एक बात बताओ। तुम चाहते तो मंत्रिपद ठुकरा सकते थे। फिर मंत्री क्यों बने?
मंत्री -महाराज ,देश और स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अगर हम देश को नहीं संभालेंगे तो  गुलाम बन जायेंगे। आज़ादी छिन जाएगी। और गुलाम व्यक्ति कभी खुश नहीं रह सकता। मैं आपका मंत्री इसलिए बना की राज्य में सुख शांति लाने में आपकी मदद कर सकूँ। और आप जानते हैं -मैंने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया है।
राजा- तुम मुझे बताकर भी यहाँ आ सकते थे।
मंत्री - आत्म विश्लेषण अकेले में ही होता है महाराज। अंतरात्मा से जुड़ने पर शक्ति मिलती है। इसलिए मैं अकेला आता हूँ। दिनभर मेहनत करता हू ताकि पसीना बहाने की आदत न छूट जाये।
राजा -आज मैं तुम्हारा परिचय जान गया। अब मैं भी अपनी वास्तविक शक्ति को पहचानकर उससे जुड़ जाऊंगा। आत्मा की प्रसन्नता प्राप्त करूँगा।
मंत्री -जनता की भावनाओं ,सुख -दुःख से जुड़िये महाराज। आप शक्ति का अनुभव करेंगे।

जंगल का वातावरण चिड़ियों के कलरव से भर उठा था। सुबह होनेवाली थी। लकड़हारा वापस मंत्री के वेश में आ चुका था। वह और राजा साथ -साथ राजधानी की ओर चल दिए -नयी ऊर्जा ,नए संकल्प से भरपूर।
दोस्तों ,अगर आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो मैं चाहूंगा कि आप आँखे बंदकर एक लम्बी और गहरी  सांस लीजिये और आँख खोलने के बाद ये दो सवाल खुद से पूछिये -
१. मेरी वास्तविक ताकत क्या है ?
२. मैं कैसे इससे जुड़ सकता हूँ।

मित्रों, ये सवाल आपको अपने आप से जोड़ देंगे। सकारात्मक परिवर्तन लाएंगे।  इस ब्लॉग का मूल उद्देश्य भी यही है। ऐसी रचनायें आपतक पहुँचाना जो आपको सकारात्मक सन्देश देती हों।
उम्मीद है दोस्तों ,कहानी पसंद आई होगी। अगर हो सके तो कमेंट्स के माध्यम से अपनी राय दीजियेगा।  जल्दी ही अगली रचना भी पोस्ट करूँगा।
धन्यवाद।

A New Begining




 
दोस्तों , आज एक  नया ब्लॉग  शुरू कर रहा हूँ।  सच कहूँ तो पिछले काफी दिनों से मैं सोच रहा था - सैंकड़ो बार मैं नेट पर बैठा , MS Word  में कई लेख लिखे ताकि शुरू में अपने ब्लॉग पर डाल  सकूँ।  लेकिन हर बार मैं पीछे हटता रहा।
जब भी कुछ लिखता था तो तीन बातें ध्यान में आती  थीं-
१. क्या मेरे द्वारा लिखे गए शब्द किसी के लिए कुछ सकारात्मक योगदान कर सकेंगे?
२. क्या मैंने जो लिखा है वो पूरी तरह सही है?
३. इंटरनेट की दुनिया में सैंकड़ो हजारों लोग तो ऐसा कुछ पहले ही कर  चुके हैं, फिर दोहराने से क्या फायदा?

सवाल नंबर एक और दो तो मैं हल कर लेता था पर सवाल नंबर तीन मुझे उलझा देता था।  और नतीजा- आज का काम कल पर टाल  दिया जाता था।  और यकीन   मानिये दोस्तों, मुझे कई महीने लग गए ये समझने में कि सवाल  नंबर तीन पूरी तरह निरर्थक था।  उसकी कोई अहमियत  ही नहीं थी। मैं जान गया कि  अगर ऐसे सवालों को महत्व दिया तो दुनिया में कोई भी व्यक्ति , किसी भी तरह की शुरुआत ही नहीं कर पायेगा।
तो अंततः मैंने फैसला कर ही लिया है की मुझे एक ब्लॉग बनाना है।  इससे मेरी लेखन शैली कुछ सुधरेगी, और मेरी भावनाओ को अभिव्यक्त होने का एक जरिया  मिल जायेगा।
आज शाम को यानि 17 अक्टूबर  २०१५  की शाम को , ये बात निश्चय  कर ली है कि  एक ब्लॉग बनाना है- अभी और बस अभी।
कबीरदास जी  का एक दोहा है-
 
कल करे सो आज कर , आज करे सो अब
पल में परलय होएगी , बहुरि करेगा कब।

तो चलो दोस्तों, मेरा ब्लॉग भी बन जायेगा अब.
 
लेकिन मित्रों , पहली बार कोई काम करना आसान भी नहीं होता - खासकर मुझ जैसे लोगों के लिए जो  संकोच करतें हैं। मेरे दिमाग में कुछ सवाल गूंजने लगे हैं और मैं उनके जवाब भी मन ही मन दे रहा हूँ।  आइये , आपको भी इन सवालों और  जवाबों से  परिचित करवाता हूँ -
१.   सवाल - ब्लॉग का नाम क्या रखेगा भाई? नाम बड़ा धांसू और शानदार  होना चाहिए वरना लोग आकर्षित नहीं होंगे हाँ।
 
जवाब - भाइयों , नाम तो महीनों पहले सोच लिया था - इस ब्लॉग का नाम bodhisattva  रखूँगा।  इसके पीछे एक कहानी है जो बाद में बताऊंगा। पता नहीं , यह नाम आकर्षक है या नहीं , लेकिन सच कहूँ तो  नाम मुझे पसंद है. वैसे भी नाम के चक्कर में काफी वक़्त जाया हुआ है।  यही नाम रखता हूँ, आगे बाद में देखा जायेगा।

२. सवाल - ब्लॉग तो बना लोगे , पर लिखोगे किस विषय पर?
जवाब - दोस्तों, पहले मैं सोचता था की अपने ब्लॉग पर लेख लिखूंगा - राजनीती पर , विज्ञानं पर , खेलों पर , सिनेमा पर etc  etc. पर अब यह बात खोपड़ी में आ रही है कि  मुझे कुछ अलग करना चाहिए , जो लोगों को भी दिलचस्प लगे और उसके माध्यम से मैं भी अपनी बात कह सकूँ।  सोचता हूँ कि कहानियों की  एक सीरीज अथवा श्रृंखला शुरू करूँ  जिसमे हमारे आस पास की घटनाएँ शामिल हों।  मैं भी अपनी बातें कहता चलूंगा - इन कहानियों के पात्रों  के माध्यम से. और लोगों का भी स्वागत रहेगा इस ब्लॉग पर  ताकि वो भी अपनी कुछ सुना सकें।   एक बात तो आज ही तय कर लेता हूँ - इस ब्लॉग में वही कहानियां आएँगी , वही शब्द, वही लेख  लिखे जाएंगे जो हमें कोई सकारात्मक सन्देश दे सकें।

३. सवाल - ब्लॉग पर अपना परिचय क्या लिखोगे  भले मानुष ? परिचय बड़ा जानदार और प्रभावशाली होना चाहिए तभी लोग तेरे विचार पढ़ेंगे।
जवाब - दोस्तों, अपने बारे में मेरा एक ही परिचय है - मैं एक आम आदमी हूँ जिसमे कुछ भी खास नहीं है.  करोड़ों की  भीड़ में एक  मैं  भी हूं।   गालियां,प्यार  हसीं  मजाक , सांत्वना , प्रशंसा  आदि सामान्य चीज़ों के अलावा और कुछ मगज़ में नहीं आता जिसे विशेष कहा जा सके। 

 
अब सवाल और नहीं।  अपने दिमाग को मैं चुप कराता  हूँ - बस चुप हो जा अब - ब्लॉग शुरू हो जाने दे - दस पांच  रचनाएँ उसपर डल  जाने दे।  उसके बाद जो चाहे बोलना -मैं सुन लूंगा।  चलिए , अपने आप से बातें करने में ही काफी लिख चुका हूँ।  इसे ही पहली पोस्ट के रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ।

 
लेकिन एक  बात जरूर कहूँगा - धन्यवाद , अपने हर पाठक को जो इस ब्लॉग को पढ़ रहे हैं।। आखिर आपने अपना समय दिया है।
चलो , ब्लॉग शुरू हो गया है।  पहली पोस्ट भी प्रकाशित हो गयी है. अब सोचूंगा कि  अगली  कड़ी के रूप में कौन सी कहानी लिखी जाए  जो मुझे भी  कुछ कहने का मौका दे और मेरे पाठकों को भी एक सकारात्मक सन्देश देती हो.
एक चाइनीज़  कहावत से अंत करता हूँ -
"
हजारों मील लम्बी यात्रा का आरम्भ पहले कदम से ही होता है "

धन्यवाद।