दोस्तों , कहानियां हमेशा से ही हमारे जीवन का हिस्सा रही हैं।
कुछ तो ऐसी होती हैं जो हमारे दिल और दिमाग पर असर छोड़ जाती हैं।
अपने
ब्लॉग की पहली प्रेरणास्पद कहानी के रूप में आज ऐसी ही एक कहानी प्रस्तुत कर रहा
हूँ जो उपयोगी है - उन लोगों के लिए जो जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं और निराशा
एवं हताशा जैसी मुश्किलों को परास्त करना चाहते हैं।
दोस्तों , अब और भूमिका न बढ़ाते हुए मैं इस कहानी को प्रस्तुत कर रहा हूँ।
एक राजा
था। एक दिन उसके मंत्री की मौत हो गयी। राजा बड़ा परेशान। वह राज्य का अधिकांश भार
मंत्री को देकर निश्चिन्त रहता था। अब उसके जैसा बुद्धिमान और ईमानदार व्यक्ति
कहां से मिले ? राजा ने बहुत लोगों के इंटरव्यू लिए
लेकिन पुराने मंत्री जैसा कोई मिला ही नहीं।
राजा
काफी ऊब गया था। एक दिन अकेला चल दिया -शिकार खेलने। राजधानी से बाहर , काफी दूर , घने जंगलों में पहुंचकर रास्ता भटक गया। शिकार तो मिला नहीं ,ऊपर से रास्ता खोजने की परेशानी आन पड़ी। शाम ढल गयी। रास्ता
नहीं मिला। पूर्णिमा की रात थी। चाँद की रौशनी में राजा इधर - उधर देखने लगा। तभी
उसे जंगल के बीच एक छोटा मैदान दिखाई दिया जिसमें एक झोपडी बनी थी। झोंपड़ी की
खिड़की से दीपक की रोशनी छिटककर बाहर आ रही थी। राजा
पेड़ों के पीछे छुपकर देखता रहा ,इंतज़ार
करता रहा। तभी एक आदमी बाहर आया। झोंपड़ी के आगे साफ़ सुथरी जगह पर टाट बिछाकर
लेट गया। वो चाँद को देखता रहा ,फिर एक
गीत गुनगुनाने लगा।
चांदनी
रात। जंगल का वातावरण। और मधुर गीत की गूंज। राजा को आनंद आ रहा था। वह उस
व्यक्ति के समीप जाकर खड़ा हो गया। वह व्यक्ति चाँद को देखने और गाने में मगन
था। उसके वस्त्र फटे पुराने थे -लकड़हारा मालूम होता था। लेकिन उसके चेहरे पर
स्वर्गिक आनंद की आभा थी। राजा के और नजदीक जाने पर उसका ध्यान टूटा। वह उठ
बैठा। नमस्कार करके अतिथि का सत्कार किया। कन्दमूल फल खाने को दिए। चाँद की
रोशनी तले राजा बैठ गया। गाना फिर सुनाने को कहा।
ठंडी
-ठंडी सुखद हवा चल रही थी। लकड़हारे का मधुर गीत गूंज रहा था। राजा की थकान कोसों
दूर भाग गयी। उसने बहुत सवाल पूछे। लकड़हारा अनाथ था ,लकड़ी बेचकर गुजारा करता था।
लेकिन था बहुत होशियार और मेहनती। राज्य की समस्याओं को बहुत गहराई से
समझता था। राजा ने उसे प्रधानमंत्री बनाने का फैसला किया। तभी लकड़हारे ने एक शर्त रखी- मैं हर पूर्णिमा को छुट्टी
पर रहूँगा\और इसके लिए मुझसे नहीं पूछा जायेगा। इस दिन मैं राज्य
द्वारा दी जानेवाली कोई सुविधा और सुरक्षा नहीं लूंगा। राजा ने शर्त मान ली
और राजधानी ले आये।
लकड़हारा
अपेक्षा से बेहतर सिद्ध हुआ। राज्य का प्रबंध बड़ी कुशलता से संभाला। प्रशासन में
चुन चुनकर योग्य लोगों की नियुक्तियां की। अयोग्य लोगों को किनारे कर दिया।
पुराने मंत्री के मरने के बाद जितने घोटाले हुए थे ,उनकी जांच करके दोषियों को सजा दी।
मंत्री
के कार्यकाल में राज्य तेजी से प्रगति करने लगा। भ्रष्ट लोगों की शामत आ गयी।
राज्य में सुख शांति छा गयी। राजा बहुत प्रसन्न रहने लगा।
लेकिन
सारे दिन एक सामान नहीं होते। कहावत है न - चोर चोर मौसेरे भाई। राज्य के तमाम
भ्र्ष्ट,अपराधी और बेईमान लोग नए मंत्री के खिलाफ संगठित होने लगे।
योजनाएं बनाने लगे। कमजोरियां ढूंढने लगे।
विरोधियों
ने लाख जतन किये। पर
सब व्यर्थ। मंत्री की कोई कमजोरी नजर नहीं आई। वह सुबह से देर रात तक राजकाज में व्यस्त रहता था। भाई -भतीजे थे
नहीं। वेतन लेता नहीं था। ऊपर से राजा उसपर जान छिड़कते थे।
आख़िरकार
कोशिशें रंग लांई। मंत्री की एक बात विचित्र थी। वह पूर्णिमा के दिन , सुबह सवेरे ,कहीं
निकल जाता था। अगली सुबह लौटता था। वो कहा जाता था ,किसी को
खबर नहीं। अगर कोई पूछता भी तो वह टाल जाता।
विरोधियों
ने इस बात का फायदा उठाया। पडोसी राज्य के मंत्री के साथ मिलकर साजिश रची। ऐसा प्रचारित
किया गया कि मंत्री
देशद्रोही है। वह महीने में एक दिन पडोसी राज्य में जाकर सारे गोपनीय रहस्य पंहुचा आता है।
तमाम सबूत भी गढ़े
गए। राजा के कान भरे जाने लगे। राजा भी विचलित होने लगा। उसने भी कई बार पूछा था -
पूर्णिमा को ही वह छुट्टी क्यों लेता है , कहाँ
जाता है ,लेकिन मंत्री ने हमेशा
टाल दिया।
अंततः
राजा ने खुद जांच की सोची। पूर्णिमा के दिन वेश बदलकर मंत्री का पीछा किया। मंत्री
मुँह अँधेरे ही घर से निकला। मुंह ढककर घोड़े पर बैठा और चल दिया। शीघ्र ही दोनों
जंगल में आ गए। मंत्री अपनी झोपडी पर पहुंचा। राजसी वस्त्र बदलकर फटे पुराने
वस्त्र पहन लिए। झोपड़ी और मैदान
बुहारकर साफ़ किया। टूट फूट की मरम्मत
की। अपनी कुल्हाड़ी तेज की। इसके बाद
सुखी लकड़ियाँ एकत्रित करके और उन्हें काटकर गठठर बनाया। समीप के बाजार में गया।
लकड़ियाँ बेचकर चना चबेना ख़रीदा। शाम ढले अपनी झोंपड़ी पर लौट आया।
नहाया धोया। दीपक जलाया। भोजन किया। चारों तरफ चांदनी छिटकने लगी थी। राजा पेड़ पर
चढ़कर सब देख रहा था।
भोजन के
बाद मंत्री बाहर आया।जमीन
पर टाट बिछाकर लेट गया। चाँद को देखकर गाने लगा। वही पुराना लोकगीत जो राजा ने
पहले सुना था। धीमी हवा में पेड़ों के पत्ते हिल रहे थे। चांदनी छिटक रही थी. सोंधी
मिटटी की खुशबू हवा में तैर रही थी। मंत्री चाँद को देखते हुए गीत गाने में मगन
था।
राजा रुक
न सका। सामने जा खड़ा हुआ। मंत्री उठ बैठा। राजा को प्रणाम
किया। राजा भी उसके साथ टाट पर बैठ गया।
राजा -
तुम हर पूर्णिमा को यहीं आते हो ?लकड़ी
काटते हो ,बेचते हो , चाँद को
देखते हो?
मंत्री -
हाँ महाराज।
राजा -
आखिर किसलिए ?
मंत्री
-क्या आप बताएँगे महाराज ,पहले मैं
क्या था?
राजा -
हाँ ,तुम लकड़हारे थे।
मंत्री
-क्या मैं मजबूरीवश एक लकड़हारा था ?
राजा
-नहीं। तुम चाहते तो कुछ अलग भी कर सकते थे। देखो ,तुम
कितने अच्छे मंत्री और कूटनीतिज्ञ साबित हुए हो।
मंत्री
-महाराज ,मैं लकड़हारा इसलिए था क्योंकि मैं ये पसंद करता था। मैंने
इसी जंगल में जनम लिया। माता पिता चल बसे। अनाथ होने के बाद इसी जंगल ने मुझे भोजन
और आश्रय दिया। पेड़ पौधे और जानवर ही मेरा परिवार बन गए। मां की ममता और पिता का
संरक्षण मुझे यहाँ की हवा में महसूस होता है।
राजा -
क्या ये कोरी भावुकता नहीं है ?
मंत्री
-नहीं महाराज , ये जमीन से जुड़ाव है। यही मेरा
शक्तिस्त्रोत है। इसे कोई मुझसे नहीं छीन सकता। धन ,प्रतिष्ठा
,मंत्रिपद ,सब छिन
सकता है। लेकिन कोई भी मुझसे लकड़हारे की पहचान नहीं छीन सकता। हाथों की
मेहनत नहीं छीन सकता।
मैं कन्द
मूल खाकर वही स्वाद लेता हू , जो आपको
राजसी भोजन में आता है। पेड़ -पौधो ,नदी-झरनों
और जानवरो को देखकर मुझे वही सुख मिलता है जो आपको अपना भरा -पूरा परिवार
देखकर मिलता है। चाँद
को देखकर गीत गाते समय मुझे वही खुशी मिलती है जो आपको राजसिंहासन देता है।
राजा -
यह तो कल्पनाओं में जीना हुआ मंत्री।
मंत्री-
अपनी वास्तविक ताकत से जुड़ने की कल्पना हमें शक्तिशाली बनाती है महाराज। यह जंगल। यह हवा। पेड़
-पौधों का संगीत। झरनों का पानी।चिड़ियों का कलरव। मेरा लोकगीत। चाँद की
रोशनी। ये सब मुझे शक्ति देते हैं। इन्हे मुझसे कोई वापस नहीं ले सकता। जबतक मैं
इनसे जुड़ा हूँ , प्रसन्न
रहूँगा।
राजा -
ये केवल एक कल्पना की उड़ान है।
मंत्री
-अच्छा महाराज ,क्या आपको सिंहासन गंवाने का डर लगता
है ?
राजा
-हाँ ,चौबीसो घंटे। विरोधी हमेशा ताक में रहते हैं।
मंत्री -
तब ये आपकी वास्तविक ताकत नहीं है महाराज जो कभी भी छिन सकती है।
राजा -तब
मेरी असली ताकत क्या है ?
मंत्री
-जनता में आपकी लोकप्रियता ही आपकी असली ताकत है। सिंहासन भले कोई ले ले ,लेकिन जनता हमेशा आपका साथ देगी।
राजा -एक
बात बताओ। तुम चाहते तो मंत्रिपद ठुकरा सकते थे। फिर मंत्री क्यों बने?
मंत्री
-महाराज ,देश और स्वतंत्रता सर्वोपरि है। अगर हम देश को नहीं
संभालेंगे तो गुलाम बन जायेंगे। आज़ादी छिन जाएगी। और गुलाम व्यक्ति कभी खुश
नहीं रह सकता। मैं आपका मंत्री इसलिए बना की राज्य में सुख शांति
लाने में आपकी मदद कर सकूँ। और आप जानते हैं -मैंने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया है।
राजा-
तुम मुझे बताकर भी यहाँ आ सकते थे।
मंत्री -
आत्म विश्लेषण अकेले में ही होता है महाराज। अंतरात्मा से जुड़ने पर शक्ति मिलती
है। इसलिए मैं अकेला आता हूँ। दिनभर मेहनत करता हू ताकि पसीना बहाने की आदत न छूट
जाये।
राजा -आज
मैं तुम्हारा परिचय जान गया। अब मैं भी अपनी वास्तविक शक्ति को पहचानकर उससे जुड़
जाऊंगा। आत्मा की प्रसन्नता प्राप्त करूँगा।
मंत्री
-जनता की भावनाओं ,सुख
-दुःख से जुड़िये महाराज। आप शक्ति का अनुभव करेंगे।
जंगल का
वातावरण चिड़ियों के कलरव से भर उठा था। सुबह होनेवाली थी। लकड़हारा वापस मंत्री के
वेश में आ चुका था। वह और राजा साथ -साथ राजधानी की ओर चल दिए -नयी ऊर्जा ,नए संकल्प से भरपूर।
दोस्तों ,अगर आप यहाँ तक पढ़ चुके हैं तो मैं चाहूंगा कि आप आँखे बंदकर
एक लम्बी और गहरी सांस
लीजिये और आँख खोलने के बाद ये दो सवाल खुद से पूछिये -
१. मेरी
वास्तविक ताकत क्या है ?
२. मैं
कैसे इससे जुड़ सकता हूँ।
मित्रों, ये सवाल आपको अपने आप से जोड़ देंगे। सकारात्मक परिवर्तन
लाएंगे। इस ब्लॉग का मूल उद्देश्य भी यही है। ऐसी रचनायें आपतक पहुँचाना जो
आपको सकारात्मक सन्देश देती हों।
उम्मीद
है दोस्तों ,कहानी पसंद आई होगी। अगर हो सके तो
कमेंट्स के माध्यम से अपनी राय दीजियेगा। जल्दी ही अगली रचना भी पोस्ट
करूँगा।
धन्यवाद।